TL बैठकों में सख्ती, शहर में अंधेरा! आखिर कलेक्टर के निर्देशों का हिसाब कौन देगा?
अब आम नागरिकों के बीच चर्चा यह है कि क्या समय-सीमा की बैठकें केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं, या फिर प्रशासन जनता को राहत देने के लिए जवाबदेही भी तय करेगा? जब जिला मुख्यालय की बिजली व्यवस्था ही नहीं संभल पा रही है, तब बड़े-बड़े निर्देशों का वास्तविक महत्व क्या रह जाता है?

जांजगीर। जिला मुख्यालय जांजगीर की चरमराई बिजली व्यवस्था अब सीधे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। 6 जुलाई 2026 को समय-सीमा की बैठक में कलेक्टर जन्मेजय महोबे ने विद्युत विभाग को निर्बाध बिजली आपूर्ति, शिकायत मिलते ही तत्काल तकनीकी दल भेजने, फॉल्ट रिस्पॉन्स टाइम कम करने और कंट्रोल रूम के नंबर सार्वजनिक करने जैसे कई निर्देश दिए थे। बैठक में उन्होंने अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी भी जताई थी। लेकिन सवाल यह है कि इन निर्देशों का धरातल पर असर आखिर कहां दिखाई दे रहा है?
जिला मुख्यालय में आज भी बार-बार बिजली गुल होना, घंटों तक फॉल्ट का ठीक नहीं होना और शिकायतों के बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं होना आम बात बन गई है। इससे साफ प्रतीत होता है कि बैठक में दिए गए निर्देशों के पालन की निगरानी या तो नहीं हो रही है, या फिर अधिकारी उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। यदि बैठक में सख्त निर्देश दिए गए थे तो उनकी समीक्षा कब हुई? जिन अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी जताई गई थी, उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई? यदि व्यवस्था नहीं सुधरी तो जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?
प्रशासनिक बैठकों का उद्देश्य केवल निर्देश देना नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना भी होता है। यदि आदेशों के बावजूद जिला मुख्यालय की जनता रोज बिजली संकट झेल रही है, तो यह प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब आम नागरिकों के बीच चर्चा यह है कि क्या समय-सीमा की बैठकें केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं, या फिर प्रशासन जनता को राहत देने के लिए जवाबदेही भी तय करेगा? जब जिला मुख्यालय की बिजली व्यवस्था ही नहीं संभल पा रही है, तब बड़े-बड़े निर्देशों का वास्तविक महत्व क्या रह जाता है?
जिले की जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है। यदि आने वाले दिनों में बिजली व्यवस्था में ठोस सुधार नहीं होता, तो यह माना जाएगा कि प्रशासनिक बैठकों की सख्ती केवल कागजों तक सीमित है और आम जनता अब भी बदहाल व्यवस्था की कीमत चुका रही है।




