कागजों में गौशाला, खाते में सब्सिडी; जांजगीर-चांपा जिले में गौ पालन योजना पर उठे बड़े सवाल, विभागीय अधिकारियों के संरक्षण में अपात्रों के नाम पर सब्सिडी और बीमा राशि का खेल वर्षों से जारी
कई मामलों में योजना के लिए जिस गाय को खरीदा हुआ दिखाया जाता है, वह वास्तव में किसी दूसरे व्यक्ति की होती है। दस्तावेजों में उसे हितग्राही के नाम पर दर्शाकर सरकारी सब्सिडी स्वीकृत करा ली जाती है। राशि निकलने के बाद गाय अपने वास्तविक मालिक के पास ही रहती है, जबकि कागजों में वह दूसरे व्यक्ति की संपत्ति बनी रहती है।

जांजगीर-चांपा। पशुपालन विभाग की गौ पालन योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को स्वरोजगार उपलब्ध कराना और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देना है, लेकिन जांजगीर-चांपा जिले में यही योजना कथित रूप से भ्रष्टाचार का माध्यम बनती जा रही है। आरोप है कि विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से पात्र हितग्राहियों को दरकिनार कर अपात्र लोगों के नाम पर योजना स्वीकृत की जा रही है। इससे शासन की लाखों रुपये की सब्सिडी निजी जेबों तक पहुंच रही है।
जानकारी के अनुसार, कई मामलों में योजना के लिए जिस गाय को खरीदा हुआ दिखाया जाता है, वह वास्तव में किसी दूसरे व्यक्ति की होती है। दस्तावेजों में उसे हितग्राही के नाम पर दर्शाकर सरकारी सब्सिडी स्वीकृत करा ली जाती है। राशि निकलने के बाद गाय अपने वास्तविक मालिक के पास ही रहती है, जबकि कागजों में वह दूसरे व्यक्ति की संपत्ति बनी रहती है।
बीमा भी बना कमाई का बड़ा जरिया
मामला सिर्फ सब्सिडी तक सीमित नहीं है। आरोप है कि योजना के तहत बीमित पशु की मृत्यु होने पर मिलने वाली बीमा राशि भी फर्जी दस्तावेजों के सहारे निकाल ली जाती है। कई मामलों में वास्तविक पशुपालक को इसकी जानकारी तक नहीं होती, जबकि अधिकारियों और संबंधित लोगों की मिलीभगत से बीमा दावा स्वीकृत कर राशि का बंदरबांट कर लिया जाता है।
जांच हो तो खुल सकती हैं कई परतें
सूत्रों का कहना है कि यदि जिले में पिछले पांच वर्षों के गौ पालन योजना के सभी प्रकरणों की भौतिक जांच कराई जाए, तो कई हितग्राहियों के यहां कागजों में दर्ज गायें ही नहीं मिलेंगी। कई मामलों में पशुओं के टैग नंबर, खरीद-बिक्री के दस्तावेज, बैंक खातों में सब्सिडी की राशि और बीमा दावों की जांच बड़े खुलासे कर सकती है।
वास्तविक पशुपालक हो रहे वंचित
योजना का लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जो वास्तव में पशुपालन कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। लेकिन आरोप है कि प्रभावशाली लोगों की सिफारिश और विभागीय मिलीभगत के कारण वास्तविक पशुपालक योजना से बाहर रह जाते हैं, जबकि अपात्र लोग सरकारी अनुदान का लाभ उठा लेते हैं।
विभागीय भूमिका पर उठ रहे सवाल
बिना विभागीय सत्यापन के न तो सब्सिडी स्वीकृत हो सकती है और न ही बीमा दावा पारित हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि गड़बड़ियां हुई हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जा रही। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होने पर कई अधिकारियों और बिचौलियों की भूमिका सामने आ सकती है।
प्रकरणों के वित्तीय आडिट की मांग
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि जिले में गौ पालन योजना के तहत स्वीकृत सभी प्रकरणों का सामाजिक और वित्तीय ऑडिट कराया जाए। प्रत्येक हितग्राही के यहां जाकर यह सत्यापित किया जाए कि सब्सिडी जिस गाय के नाम पर जारी हुई, वह वास्तव में उसी के पास है या नहीं। साथ ही बीमा दावों की भी स्वतंत्र जांच कर दोषियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।





