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जनसुनवाई या सिर्फ औपचारिकता? बिरगहनी में प्रस्तावित कोल वाशरी विस्तार और पावर प्लांट पर उठने लगे बड़े सवाल

बलौदा तहसील के ग्राम बिरगहनी में हिंद मल्टी सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित कोल वाशरी विस्तार और 25 मेगावाट एएफबीसी पावर प्लांट को लेकर 3 जून 2026 को होने वाली जनसुनवाई से पहले ही क्षेत्र में विरोध और आशंकाओं का माहौल बन गया है। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि जिस परियोजना से हजारों लोगों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और खेती-किसानी पर असर पड़ सकता है, उसकी पूरी जानकारी आज तक गांव-गांव तक नहीं पहुंचाई गई।

NKD@जांजगीर-चांपा। बलौदा तहसील के ग्राम बिरगहनी में हिंद मल्टी सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित कोल वाशरी विस्तार और 25 मेगावाट एएफबीसी पावर प्लांट को लेकर 3 जून 2026 को होने वाली जनसुनवाई से पहले ही क्षेत्र में विरोध और आशंकाओं का माहौल बन गया है। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि जिस परियोजना से हजारों लोगों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और खेती-किसानी पर असर पड़ सकता है, उसकी पूरी जानकारी आज तक गांव-गांव तक नहीं पहुंचाई गई।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या जनसुनवाई वास्तव में जनता की राय जानने के लिए हो रही है या फिर यह केवल पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करने की एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी?

पहले से प्रदूषण झेल रहा इलाका, फिर क्यों बढ़ाया जा रहा बोझ?

कंपनी वर्तमान 0.96 एमटीपीए क्षमता की कोल वाशरी का विस्तार कर 2.4 एमटीपीए करने जा रही है। इसके साथ ही 25 मेगावाट का पावर प्लांट भी प्रस्तावित है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या क्षेत्र की वायु गुणवत्ता, जल स्रोतों और कृषि भूमि पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव का निष्पक्ष आकलन किया गया है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले से ही क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के कारण धूल और प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। ऐसे में कोयले की आवाजाही बढ़ने से भारी वाहनों का दबाव भी बढ़ेगा, जिससे सड़क सुरक्षा और पर्यावरण दोनों प्रभावित होंगे।

जनसुनवाई से पहले जनता को कितनी जानकारी मिली?

परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) की प्रतियां विभिन्न कार्यालयों में उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। गांवों में न तो व्यापक जनजागरूकता अभियान चला और न ही परियोजना के संभावित प्रभावों पर खुली चर्चा हुई।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रभावित लोगों को पूरी जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो वे अपनी आपत्तियां और सुझाव प्रभावी ढंग से कैसे रख पाएंगे?

रोजगार का वादा या प्रदूषण का सौदा?

औद्योगिक परियोजनाओं के साथ रोजगार सृजन का तर्क हमेशा दिया जाता है, लेकिन क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पिछली कई परियोजनाओं में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिला। अब ग्रामीण पूछ रहे हैं कि इस परियोजना से कितने स्थायी रोजगार स्थानीय लोगों को मिलेंगे और इसकी कोई लिखित गारंटी है या नहीं?

पर्यावरणीय मंजूरी से पहले जवाब जरूरी

ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई में केवल उपस्थिति दर्ज कराना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनी और प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए क्या ठोस व्यवस्था होगी? भूजल और सतही जल स्रोतों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? राख और औद्योगिक अपशिष्ट का निपटान कहां होगा? भारी वाहनों से प्रभावित गांवों को क्या राहत मिलेगी? स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की क्या बाध्यकारी नीति होगी? जनता की आवाज सुनी जाएगी या फाइलों में दब जाएगी?

3 जून 2026 की जनसुनवाई अब केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि यह क्षेत्र के पर्यावरण, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। लोगों की नजर इस बात पर रहेगी कि उनकी आपत्तियां और सुझाव वास्तव में रिकॉर्ड किए जाते हैं या फिर जनसुनवाई की कार्यवाही केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है।

यदि परियोजना जनता के हित में है तो कंपनी को सभी सवालों के जवाब देने चाहिए, और यदि जवाब नहीं हैं तो फिर पर्यावरणीय मंजूरी की जल्दबाजी क्यों? यही सवाल आज बिरगहनी और आसपास के गांवों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।

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