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अंगूठे के निशान ने छीन लिया निवाला: कुष्ठ रोग से पीड़ित महिलाओं की दर्दभरी पुकार, “बीमारी हमारी है, भूख क्यों हमारी सजा बने?”

अपनी पीड़ा और भूख की लड़ाई लेकर ये महिलाएं कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं। उनके हाथों में राशन कार्ड थे, लेकिन चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। महिलाओं ने कलेक्टर से गुहार लगाते हुए कहा कि बीमारी ने पहले ही उनका जीवन कठिन बना दिया है, अब राशन नहीं मिलने से परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का भी संकट खड़ा हो गया है।

जांजगीर-चांपा। सरकारी योजनाओं का उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाना है, लेकिन जब तकनीक ही जरूरतमंदों के लिए दीवार बन जाए, तब व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। ऐसा ही मार्मिक मामला जांजगीर-चांपा जिले के चांपा स्थित घोघरा नाला से सामने आया है, जहां कुष्ठ रोग से पीड़ित महिलाओं को सिर्फ इसलिए महीनों से राशन नहीं मिल पा रहा क्योंकि उनके अंगूठे के निशान ई-पॉस मशीन में मैच नहीं हो रहे हैं।

अपनी पीड़ा और भूख की लड़ाई लेकर ये महिलाएं कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं। उनके हाथों में राशन कार्ड थे, लेकिन चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। महिलाओं ने कलेक्टर से गुहार लगाते हुए कहा कि बीमारी ने पहले ही उनका जीवन कठिन बना दिया है, अब राशन नहीं मिलने से परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का भी संकट खड़ा हो गया है।

महिलाओं ने बताया कि राशन कार्ड बनने के बाद शुरूआती दो-तीन महीनों तक उन्हें नियमित रूप से खाद्यान्न मिला, लेकिन बाद में राशन दुकान में ई-पॉस मशीन से फिंगरप्रिंट सत्यापन अनिवार्य होने के कारण उनका राशन बंद कर दिया गया। कुष्ठ रोग की वजह से उनके अंगूठों के निशान लगभग मिट चुके हैं या इतने क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि मशीन उन्हें पहचान ही नहीं पाती। परिणामस्वरूप हर महीने उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है।

पीड़ित महिलाओं का कहना है कि वे कई बार राशन दुकान संचालक और संबंधित अधिकारियों से अपनी समस्या बता चुकी हैं, लेकिन हर बार यही जवाब मिलता है कि “मशीन में अंगूठा नहीं लग रहा है, इसलिए राशन नहीं दिया जा सकता।” उनका सवाल है कि जब बीमारी की वजह से अंगूठे के निशान ही नहीं बच पाए, तो इसमें उनकी क्या गलती है?

महिलाओं ने कलेक्टर से मांग की है कि उनकी विशेष परिस्थितियों को देखते हुए फिंगरप्रिंट के बजाय आधार ओटीपी, आईरिस स्कैन, नामित परिवार सदस्य के माध्यम से सत्यापन या शासन द्वारा उपलब्ध किसी अन्य वैकल्पिक व्यवस्था से उन्हें नियमित राशन उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि तकनीकी खामी की सजा उन्हें भूखे रहकर नहीं भुगतनी चाहिए।

यह मामला केवल कुछ महिलाओं का नहीं, बल्कि उन तमाम दिव्यांग, वृद्ध और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों की समस्या को भी उजागर करता है, जिनके बायोमेट्रिक निशान समय के साथ कमजोर या समाप्त हो जाते हैं। सवाल यह है कि जब शासन की योजनाएं गरीब और असहाय लोगों के लिए बनाई गई हैं, तो क्या तकनीकी बाधाओं के कारण उन्हें उनके अधिकार से वंचित किया जाना उचित है?

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। यदि प्रशासन इन महिलाओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करता है, तो यह न केवल उनकी भूख मिटाएगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि संवेदनशील शासन केवल नियमों से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी चलता है। आखिर बीमारी किसी की पसंद नहीं होती, लेकिन भूख से राहत दिलाना शासन की जिम्मेदारी जरूर होती है।

Rajendra Rathore

राजेंद्र राठौर विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उनके परिवार में पत्रकारिता का कोई पारंपरिक इतिहास नहीं रहा, फिर भी उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की। उन्होंने वर्ष 2001 में दैनिक नवभारत में सर्वेयर के रूप में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। वर्ष 2017 में उन्होंने दैनिक नवीन कदम समाचार पत्र समूह में कार्यभार संभाला और तब से वे आज पर्यंत “स्थानीय संपादक” के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

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