कागजों में खरीदी गई गाय, हकीकत में मालिक कोई और… जांजगीर-चांपा में गौ पालन योजना में फर्जीवाड़े का नया मॉडल
दस्तावेजों में हितग्राही बदलकर निकाली जा रही सरकारी सब्सिडी, भुगतान के बाद गाय लौट जाती है असली मालिक के पास; जांच हुई तो खुल सकते हैं बड़े राज

जांजगीर-चांपा। पशुपालन विभाग की गौ पालन योजना के संचालन को लेकर जांजगीर-चांपा जिले में एक ऐसा कथित खेल सामने आ रहा है, जिसने पूरी योजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभागीय अधिकारियों, बिचौलियों और कुछ पशु व्यापारियों की मिलीभगत से सरकारी सब्सिडी हासिल करने के लिए गायों का केवल कागजी लेन-देन किया जा रहा है।
गौ पालन योजना के तहत खरीदी गई गाय वास्तव में हितग्राही के पास कभी रहती ही नहीं, बल्कि सब्सिडी की राशि निकलते ही वह फिर अपने पुराने मालिक के पास पहुंच जाती है। सूत्रों के अनुसार, यह पूरा खेल योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है। पहले ऐसे लोगों की तलाश की जाती है जिनके नाम पर गौ पालन योजना स्वीकृत कराई जा सके। इसके बाद किसी पशु व्यापारी या बड़े पशुपालक की गाय को कागजों में खरीदा हुआ दिखाकर खरीद-बिक्री के दस्तावेज तैयार कर दिए जाते हैं।
निरीक्षण तक रहती है गाय, फिर लौट जाती है पुराने मालिक के पास
बताया जाता है कि योजना स्वीकृत होने के दौरान और विभागीय निरीक्षण तक गाय हितग्राही के पास दिखाई जाती है, ताकि सभी औपचारिकताएं पूरी हो सकें। जैसे ही सब्सिडी की राशि बैंक खाते में पहुंचती है, गाय को वापस उसके वास्तविक मालिक के पास भेज दिया जाता है। इस प्रकार सरकारी रिकॉर्ड में गाय हितग्राही के नाम पर दर्ज रहती है, जबकि वास्तविक कब्जा किसी और का होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी सब्सिडी तो निकल जाती है, लेकिन योजना का मूल उद्देश्य पूरी तरह समाप्त हो जाता है। वास्तविक रूप से न तो नया पशुपालन शुरू होता है और न ही दुग्ध उत्पादन में कोई वृद्धि होती है।
कागजों में सब ठीक, जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग
सूत्रों का कहना है कि विभागीय रिकॉर्ड में सभी दस्तावेज पूरे मिल जाएंगे। खरीद-बिक्री के बिल, बैंक भुगतान, पशु टैगिंग, बीमा, निरीक्षण रिपोर्ट और लाभार्थी का आवेदन—सब कुछ नियमानुसार दिखाई देगा। लेकिन यदि किसी भी हितग्राही के यहां छह महीने या एक वर्ष बाद भौतिक सत्यापन कराया जाए, तो कई मामलों में गाय वहां मिलेगी ही नहीं।
यही कारण है कि योजना के दस्तावेजों और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर होने की आशंका जताई जा रही है।
एक ही गाय से कई बार सब्सिडी लेने की भी चर्चा
ग्रामीण क्षेत्रों में यह भी चर्चा है कि कुछ मामलों में एक ही गाय का उपयोग अलग-अलग समय में कई हितग्राहियों के नाम पर दिखाकर बार-बार सब्सिडी लेने का खेल किया जाता है। गाय का मालिक वही रहता है, लेकिन कागजों में खरीदार बदलते रहते हैं। यदि इस पहलू की जांच की जाए तो बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता सामने आ सकती है।
बीमा योजना भी संदेह के घेरे में
मामला केवल सब्सिडी तक सीमित नहीं बताया जा रहा। आरोप है कि जिन गायों का बीमा कराया जाता है, उनकी मृत्यु होने पर बीमा दावा भी कई बार विवादों में रहता है। यदि बीमा दावों, टैग नंबरों और वास्तविक पशुओं का मिलान किया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
जांच कैसे हो सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन निष्पक्ष जांच करना चाहता है तो केवल फाइलों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए—
- पिछले पांच वर्षों में स्वीकृत सभी गौ पालन प्रकरणों का भौतिक सत्यापन कराया जाए।
- प्रत्येक गाय के टैग नंबर का मौके पर मिलान किया जाए।
- खरीद-बिक्री करने वाले विक्रेताओं से पूछताछ की जाए।
- लाभार्थियों के यहां वर्तमान में गाय की उपलब्धता की पुष्टि की जाए।
- बैंक खातों में गई सब्सिडी राशि के उपयोग की जांच हो।
- बीमा दावों और मृत्यु प्रमाणन की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
विभागीय भूमिका पर उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की जानकारी के इस प्रकार का खेल लंबे समय तक चल पाना संभव नहीं है। क्योंकि योजना स्वीकृति, निरीक्षण, टैगिंग और भुगतान की प्रत्येक प्रक्रिया विभाग की निगरानी में होती है। ऐसे में यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय होना भी आवश्यक होगा।
EOW से जांच की मांग तेज
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि गौ पालन योजना के सभी प्रकरणों की आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। यदि जांच में फर्जी खरीद-बिक्री, कागजी हितग्राही या सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों, बिचौलियों और लाभ लेने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं।





