टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही मुख्यमंत्री से करा दिया करोड़ों के कार्यों का भूमिपूजन, लोक निर्माण विभाग पर गंभीर सवाल
आरोप है कि जब निविदा जमा करने की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हुई, तब तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन तथा ठेकेदार चयन की प्रक्रिया भी स्वाभाविक रूप से बाकी है। ऐसे में भूमिपूजन कराने के निर्णय पर सवाल उठ रहे हैं।

NKD@जांजगीर-चांपा। जिले में आयोजित मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के विकास कार्यों के लोकार्पण एवं भूमिपूजन कार्यक्रम को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि लोक निर्माण विभाग (PWD) और जिला प्रशासन ने जल्दबाजी में ऐसे कई निर्माण कार्यों का भूमिपूजन करा दिया, जिनकी निविदा (टेंडर) प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुई है।
मामले में आरोप लगाया जा रहा है कि संबंधित अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को वास्तविक स्थिति से अवगत कराए बिना करोड़ों रुपये के निर्माण कार्यों का शिलान्यास करवा दिया, जबकि विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार कई परियोजनाओं की निविदाएं अभी भी प्रक्रिया में हैं और उनकी अंतिम तिथि जून माह के अंत तक निर्धारित है।
ऑनलाइन दस्तावेजों के आधार पर उठे सवाल
आरोपों के अनुसार, लोक निर्माण विभाग के ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज जानकारी बताती है कि कुछ निर्माण कार्यों की निविदाएं अभी भी “लाइव” स्थिति में हैं। इनमें झिलमिले से भैंसो मार्ग वाया नहर पार निर्माण कार्य, नवापारा (ब) से महूदा (ब) मार्ग निर्माण कार्य तथा देवरी-तनौद-भुईगांव-शुक्लाभाठा-ससाहा मार्ग चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण जैसे करोड़ों रुपये के कार्य शामिल हैं। इन निविदाओं की अंतिम तिथि 18 जून से 30 जून 2026 तक बताई जा रही है।
आरोप है कि जब निविदा जमा करने की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हुई, तब तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन तथा ठेकेदार चयन की प्रक्रिया भी स्वाभाविक रूप से बाकी है। ऐसे में भूमिपूजन कराने के निर्णय पर सवाल उठ रहे हैं।
कार्यपालन अभियंता के बयान पर भी विवाद
इस संबंध में लोक निर्माण विभाग की कार्यपालन अभियंता ममता पटेल का पक्ष सामने आया है। उनका कहना है कि प्रशासकीय स्वीकृति मिलने के बाद भूमिपूजन कराया गया है।
हालांकि, आरोप लगाने वालों का कहना है कि प्रशासकीय स्वीकृति केवल परियोजना को प्रशासनिक मंजूरी प्रदान करती है। निर्माण कार्य शुरू करने से पहले निविदा प्रक्रिया, ठेकेदार चयन, अनुबंध निष्पादन और कार्यादेश जारी होना आवश्यक माना जाता है। इसी आधार पर विभागीय कार्रवाई को नियमों के विपरीत बताया जा रहा है।
उठ रहे हैं कई महत्वपूर्ण सवाल
आरोपों के बीच अब कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आ रहे हैं कि जब निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, तब भूमिपूजन की अनुमति किस आधार पर दी गई? क्या मुख्यमंत्री को परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति की जानकारी दी गई थी? यदि निविदा प्रक्रिया में कोई तकनीकी बाधा आती है या टेंडर निरस्त हो जाता है, तो भूमिपूजन की जवाबदेही किसकी होगी? क्या यह केवल राजनीतिक और प्रशासनिक उपलब्धि दिखाने की जल्दबाजी थी?
जांच और कार्रवाई की मांग
मामले को लेकर अब प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। आरोप लगाने वालों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रक्रियागत त्रुटि नहीं, बल्कि शासन की वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर अनदेखी का मामला हो सकता है।
(नोट: समाचार में उल्लेखित तथ्य आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। संबंधित विभाग या प्रशासन का विस्तृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)





