मुख्यमंत्री के भूमिपूजन पर उठे सवाल, क्या टेंडर से पहले शिलान्यास की अनुमति देते हैं नियम?
लोक निर्माण विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिन कई सड़कों और निर्माण कार्यों का भूमिपूजन कराया गया, उनकी निविदा प्रक्रिया अभी भी जारी बताई जा रही है। कुछ कार्यों की अंतिम निविदा तिथि 30 जून 2026 तक निर्धारित है। ऐसे में अब प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किस आधार पर इन परियोजनाओं को "भूमिपूजन योग्य" माना गया।

एनकेडी@जांजगीर-चांपा। करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के भूमिपूजन को लेकर उठे विवाद के बाद अब पूरा मामला प्रशासनिक और वित्तीय नियमों की कसौटी पर आ गया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से किन कार्यों का भूमिपूजन कराया गया, बल्कि यह भी है कि क्या निविदा प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी निर्माण कार्य का शिलान्यास करना शासकीय नियमों के अनुरूप है?

लोक निर्माण विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिन कई सड़कों और निर्माण कार्यों का भूमिपूजन कराया गया, उनकी निविदा प्रक्रिया अभी भी जारी बताई जा रही है। कुछ कार्यों की अंतिम निविदा तिथि 30 जून 2026 तक निर्धारित है। ऐसे में अब प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किस आधार पर इन परियोजनाओं को “भूमिपूजन योग्य” माना गया।

टेंडर से पहले शिलान्यास, बाद में बदल जाए ठेकेदार या निरस्त हो जाए निविदा तो क्या होगा?
जानकारों का मानना है कि किसी भी निर्माण कार्य की प्रशासकीय स्वीकृति मिलने के बाद भी निविदा प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक होता है। इसी प्रक्रिया से यह तय होता है कि कार्य कौन करेगा, कितनी लागत पर करेगा और क्या सभी तकनीकी शर्तें पूरी हुई हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि बाद में किसी कार्य की निविदा निरस्त हो जाती है, दरें अधिक आने के कारण प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती है या तकनीकी कारणों से परियोजना में संशोधन करना पड़ता है, तो पहले से किया गया भूमिपूजन किस स्थिति में माना जाएगा?
क्या सिर्फ कार्यक्रम की भव्यता बढ़ाने के लिए जोड़े गए थे अधूरे प्रोजेक्ट?
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में अधिक से अधिक विकास कार्यों का आंकड़ा दिखाने की कोशिश की गई। आरोप यह भी लग रहे हैं कि इसी वजह से कुछ ऐसे कार्यों को भी भूमिपूजन सूची में शामिल कर लिया गया, जिनकी निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण तक भी नहीं पहुंची थी।
यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल प्रक्रियागत लापरवाही नहीं बल्कि शासन को अधूरी जानकारी देने का मामला भी माना जा सकता है।
PWD की चुप्पी और बढ़ा रही सवाल
विवाद सामने आने के बाद भी विभाग की ओर से अब तक कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। कार्यपालन अभियंता ममता पटेल ने प्रशासकीय स्वीकृति के आधार पर भूमिपूजन कराए जाने की बात कही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या विभाग के पास टेंडर प्रक्रिया पूर्ण हुए बिना शिलान्यास कराने संबंधी कोई विशेष आदेश या वैधानिक प्रावधान मौजूद है।
अब नजर सरकार पर
मामले के सार्वजनिक होने के बाद निगाहें अब राज्य सरकार और उच्च अधिकारियों पर टिक गई हैं। यदि जांच होती है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह केवल प्रशासनिक जल्दबाजी थी या फिर नियमों को दरकिनार कर मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में विकास कार्यों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया गया।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि “जब टेंडर प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, तब भूमिपूजन की इतनी जल्दबाजी आखिर किस बात की थी?”




