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जंगलों की पगडंडियों से पद्मश्री तक: बस्तर की धड़कन बने गोडबोले दंपति, वर्षों तक आदिवासी अंचलों में बिना थके जलाते रहे सेवा का दीप, अब राष्ट्र ने भी झुककर किया सम्मान

यह कहानी है पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता गोडबोले की, जिन्होंने बस्तर के सुदूर वनांचलों को केवल कार्यक्षेत्र नहीं, बल्कि अपना परिवार मान लिया।

राजेंद्र राठौर@रायपुर/बस्तर। जहां आज भी कई गांवों तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कें नहीं हैं, जहां बीमार व्यक्ति को घंटों पैदल चलकर उपचार तक पहुंचना पड़ता है, वहां एक दंपति ने अपना पूरा जीवन लोगों की धड़कनों को बचाने में लगा दिया।

यह कहानी है पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता गोडबोले की, जिन्होंने बस्तर के सुदूर वनांचलों को केवल कार्यक्षेत्र नहीं, बल्कि अपना परिवार मान लिया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गोडबोले दंपति को पद्मश्री सम्मान मिलने पर इसे पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण बताया है। उन्होंने कहा कि सेवा, समर्पण और संवेदनशीलता से भरा उनका जीवन राष्ट्र निर्माण का श्रेष्ठ उदाहरण है।

उल्लेखनीय है कि डॉ. रामचंद्र गोडबोले मूलतः एक शिक्षित और संपन्न पृष्ठभूमि से आते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में बेहतर करियर और सुविधाजनक जीवन उनके सामने मौजूद था, लेकिन उन्होंने शहरों की चमक-दमक के बजाय बस्तर के घने जंगलों और आदिवासी बस्तियों को चुना। उनकी पत्नी श्रीमती सुनीता गोडबोले ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया और दोनों ने मिलकर मानव सेवा को ही अपना जीवन धर्म बना लिया।

वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ने के बाद गोडबोले दंपति ने बस्तर के बारसूर और आसपास के दूरस्थ क्षेत्रों में रहकर वर्षों तक जनजातीय समाज के बीच काम किया। उस दौर में न स्वास्थ्य सुविधाएं थीं, न संसाधन, न परिवहन की सुविधा। कई बार बारिश, उफनती नदियों और जंगलों के बीच पैदल चलकर मरीजों तक पहुंचना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी अपने कदम पीछे नहीं खींचे।


जिन गांवों में डॉक्टर का नाम भी अनजान था, वहां पहुंचाया भरोसा

गोडबोले दंपति ने केवल दवाइयां नहीं बांटीं, बल्कि लोगों के मन में विश्वास जगाया। उन्होंने ग्रामीणों को साफ-सफाई, पोषण, मातृ-स्वास्थ्य और प्राथमिक उपचार के प्रति जागरूक किया। कुपोषण और सामान्य बीमारियों से जूझ रहे बच्चों व महिलाओं के लिए उनका काम किसी जीवनदायिनी उम्मीद से कम नहीं था। स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार आधी रात को भी जब कोई बीमार पड़ता था, तो गोडबोले दंपति बिना किसी भेदभाव के मदद के लिए पहुंच जाते थे। उनके लिए मरीज केवल एक केस नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य होता था।

सेवा ही बनी पहचान, पद्मश्री ने दी राष्ट्रीय मान्यता

राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू द्वारा पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया जाना केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उन अनगिनत वर्षों की तपस्या का सम्मान है, जो उन्होंने जंगलों और जनजातीय समाज के बीच बिताए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री साय ने कहा कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी जिस प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता के साथ गोडबोले दंपति ने कार्य किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन सभी लोगों को समर्पित है, जो बिना किसी अपेक्षा के समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने का संकल्प लेकर काम कर रहे हैं।

बस्तर के लोगों के लिए ‘डॉक्टर साहब’ नहीं, अपने परिवार जैसे हैं गोडबोले दंपति

आज भी बस्तर के अनेक गांवों में गोडबोले दंपति का नाम सम्मान और अपनत्व के साथ लिया जाता है। वहां के लोगों के लिए वे केवल डॉक्टर नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में सहारा बनने वाले अपने लोग हैं। यही कारण है कि पद्मश्री सम्मान की खबर सुनते ही पूरे बस्तर में खुशी और गर्व का माहौल है।

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