डीएपी पर बढ़ती निर्भरता बनी चिंता, संतुलित उर्वरक उपयोग अपनाएं किसान : इंजीनियर रवि पाण्डेय
“सिर्फ डीएपी नहीं, मिट्टी को चाहिए संतुलित पोषण… वैज्ञानिक खेती से ही बढ़ेगा उत्पादन और बचेगी जमीन की उर्वरता”

जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन की तैयारियों के बीच डीएपी खाद की बढ़ती खपत ने उर्वरक प्रबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। खेती-किसानी के इस अहम दौर में भारतीय जनता पार्टी प्रदेश किसान मोर्चा के प्रवक्ता इंजी. रवि पाण्डेय ने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति से उर्वरकों के उपयोग की अपील की है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई हिस्सों में किसान परंपरागत सोच के चलते केवल डीएपी खाद पर अधिक निर्भर हो गए हैं, जबकि आधुनिक कृषि विज्ञान के अनुसार अच्छी फसल के लिए मिट्टी को संतुलित पोषण देना बेहद जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिर्फ एक उर्वरक के भरोसे खेती करने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और लंबे समय में उत्पादन क्षमता भी घटने लगती है।
इंजी. रवि पाण्डेय ने बताया कि फसल को बेहतर वृद्धि के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर सहित सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। यदि इन तत्वों का संतुलन बना रहे तो फसल की पैदावार बढ़ती है, मिट्टी की उर्वरता सुरक्षित रहती है और किसानों की लागत भी नियंत्रित होती है।
उन्होंने कृषि विशेषज्ञों का हवाला देते हुए कहा कि लगातार एक ही प्रकार के उर्वरक का उपयोग करने से मिट्टी का पोषण चक्र असंतुलित हो जाता है। इसका सीधा असर उत्पादन और फसल की गुणवत्ता पर दिखाई देता है। ऐसे में किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक योजना तैयार करनी चाहिए।
प्रदेश किसान मोर्चा ने किसानों से कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे वैज्ञानिक मार्गदर्शन का लाभ लेने की भी अपील की है। इंजी. पाण्डेय ने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसान अब तेजी से नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाह को अपना रहे हैं, जो आने वाले कृषि सीजन में सकारात्मक परिणाम देगा।
उन्होंने विश्वास जताया कि यदि किसान संतुलित पोषण और वैज्ञानिक खेती की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो इससे न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।





