छत्तीसगढ़छालीवुडटॉप न्यूज़बॉलीवुडलोकल न्यूज़
Trending

डभरा में डांडिया के नाम पर मायूसी, बड़े कलाकारों का शोर-शराबा, मंच पर चंद गानों में खत्म हुआ मनोरंजन

14 से 17 अक्टूबर तक हुए आयोजनों पर उठे सवाल, कहीं नाराजगी के बाद कलाकारों के लौटने की चर्चा तो कहीं सीमित प्रस्तुति से दर्शक निराश; टिकट खरीदने वालों ने पूछा—जब पैसा पूरा लिया तो मनोरंजन अधूरा क्यों?

डोलकुमार निषाद@डभरा। नवरात्रि में डांडिया और गरबा के नाम पर दर्शकों को मनोरंजन का रंगीन सपना दिखाया गया, लेकिन कुछ आयोजनों के बाद यही उत्साह मायूसी में बदलने की शिकायतें सामने आने लगीं। छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत के कलाकारों के नाम, आकर्षक प्रचार और टिकट लेकर कार्यक्रम देखने की उम्मीद—इन सबके बीच कुछ दर्शकों का कहना है कि उन्हें अपेक्षा के अनुरूप प्रस्तुति नहीं मिल पाई। कहीं कलाकारों के नाराज होकर लौटने की चर्चा है, तो कहीं कुछ गानों के बाद ही कार्यक्रम समाप्त होने की शिकायत की जा रही है।

दरअसल, 14 से 17 अक्टूबर 2026 तक डभरा नगर में अलग-अलग स्थानों पर आयोजित डांडिया कार्यक्रमों को लेकर अब आयोजन व्यवस्था, कलाकारों के साथ समन्वय और टिकट खरीदने वाले दर्शकों के प्रति आयोजकों की जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह नहीं कि कार्यक्रम कितना भव्य दिखाया गया, बल्कि यह है कि मंच पर दर्शकों को वास्तव में कितना मनोरंजन मिला?

बड़े कलाकारों के नाम पर किया गया प्रचार

किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में लोकप्रिय कलाकारों की मौजूदगी दर्शकों को आकर्षित करती है। आयोजक जब बड़े नामों के साथ प्रचार करते हैं और टिकट के माध्यम से प्रवेश देते हैं, तो दर्शकों की अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं। लोग अपने पसंदीदा कलाकारों को देखने, उनके गीतों पर झूमने और यादगार शाम बिताने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं।

लेकिन डभरा के कुछ डांडिया आयोजनों को लेकर दर्शकों की शिकायत है कि प्रचार से बनी उम्मीद और मंच पर मिली प्रस्तुति के बीच अंतर दिखाई दिया। कुछ युवाओं का कहना है कि कलाकारों के नाम पर टिकट खरीदने के बाद भी उन्हें पर्याप्त समय तक कार्यक्रम देखने का अवसर नहीं मिला।

दर्शकों का सीधा सवाल है—अगर कार्यक्रम में बड़े कलाकारों की प्रस्तुति ही मुख्य आकर्षण है, तो उनके मंच पर रहने का समय और कार्यक्रम की अवधि को लेकर स्पष्टता क्यों नहीं रखी गई?

नाराजगी के बाद कलाकारों के लौटने की चर्चा

14 अक्टूबर को आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर चर्चा है कि आयोजन समिति से जुड़े किसी विषय पर नाराजगी के बाद छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत से जुड़े कलाकारों ने सीमित समय तक प्रस्तुति दी और फिर रायपुर लौटने का निर्णय लिया।

बताया जाता है कि समिति के सदस्यों ने कलाकारों को मनाने का प्रयास भी किया, लेकिन वे कार्यक्रम छोड़कर वापस चले गए। हालांकि, कलाकारों की नाराजगी की वास्तविक वजह क्या थी, इस संबंध में आयोजन समिति और संबंधित कलाकारों का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है।

यदि यह घटनाक्रम दर्शकों की शिकायतों के अनुरूप हुआ, तो इससे कार्यक्रम से पहले कलाकारों के साथ किए गए समन्वय, प्रस्तुति की समय-सारिणी और मंच प्रबंधन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई कि दर्शक अपने पसंदीदा कलाकारों की पूरी प्रस्तुति देखने की उम्मीद लेकर पहुंचे और उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा?

सेल्फी में समय बीता, गानों के बाद कार्यक्रम खत्म

17 अक्टूबर को आयोजित डांडिया कार्यक्रम को लेकर भी कुछ दर्शकों ने असंतोष जाहिर किया। उनका कहना है कि कलाकारों के मंच पर पहुंचने के बाद सेल्फी और फोटोग्राफी में काफी समय निकल गया। इसके बाद लगभग पांच से छह गानों की प्रस्तुति हुई और कलाकार मंच से उतर गए।

दर्शकों के अनुसार, पूरा कार्यक्रम करीब एक घंटे के भीतर समाप्त हो गया। टिकट लेकर पहुंचे कुछ लोगों को लगा कि उन्हें जितनी देर और जिस स्तर के मनोरंजन की उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो सकी। दर्शकों का कहना है कि कलाकारों के साथ फोटो खिंचवाना और सेल्फी लेना अपनी जगह है, लेकिन टिकट खरीदने का मुख्य उद्देश्य उनकी प्रस्तुति देखना होता है। यदि मंचीय कार्यक्रम का समय सीमित रह जाए, तो दर्शकों के मन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।

टिकट के पैसे लिए पूरे, तो मनोरंजन अधूरा क्यों?

टिकट खरीदकर किसी कार्यक्रम में पहुंचने वाला दर्शक केवल आयोजन स्थल पर मौजूद रहने के लिए पैसे खर्च नहीं करता। वह एक अनुभव, मनोरंजन और अपनी पसंद के कलाकारों की प्रस्तुति की उम्मीद लेकर आता है। ऐसे में जब कार्यक्रम अपेक्षा से पहले समाप्त होने की शिकायत सामने आती है, तो टिकट की राशि और मिलने वाली सुविधा के बीच अंतर पर सवाल उठना लाजिमी है। क्षेत्र के कुछ युवाओं का कहना है कि आयोजकों को टिकट बेचने से पहले कार्यक्रम की संभावित अवधि और कलाकारों की प्रस्तुति के संबंध में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

दर्शकों के सवाल भी सीधे हैं—क्या प्रचार के दौरान कलाकारों की प्रस्तुति और कार्यक्रम की अवधि की स्पष्ट जानकारी दी गई थी? यदि कलाकार निर्धारित समय तक प्रस्तुति नहीं दे पाए, तो दर्शकों को इसकी सूचना क्यों और कैसे दी गई? कार्यक्रम की अवधि कम होने की स्थिति में दर्शकों की शिकायतों के समाधान की क्या व्यवस्था थी? क्या आयोजन समिति ने दर्शकों की अपेक्षाओं और टिकट की राशि के अनुरूप मनोरंजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सुनिश्चित की?

डांडिया आयोजनों के सामने अलग चुनौती

नवरात्रि के दौरान डभरा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जसगीत, माता की आराधना और धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी हुआ। इन आयोजनों में लोगों की भागीदारी और रुचि की चर्चा रही। वहीं, टिकट आधारित डांडिया कार्यक्रमों को लेकर उठी शिकायतों ने आयोजन की गुणवत्ता और दर्शकों की अपेक्षाओं पर नई बहस छेड़ दी है।

हालांकि, जसगीत कार्यक्रमों में अधिक और डांडिया आयोजनों में कम प्रतिसाद मिलने के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दर्शकों की पसंद, आयोजन स्थल, टिकट दर, प्रचार, समय और कार्यक्रम की गुणवत्ता जैसे कई पहलू इसमें भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दर्शकों का भरोसा बनाए रखने के लिए केवल बड़े कलाकारों के नाम पर्याप्त नहीं हैं। आयोजन की वास्तविक गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आयोजन की चमक से ज्यादा जरूरी जवाबदेही

डभरा में सामने आई शिकायतें आयोजकों के लिए आत्ममंथन का अवसर हैं। किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम की सफलता केवल मंच की सजावट, प्रचार-प्रसार और लोकप्रिय चेहरों की मौजूदगी से नहीं मापी जा सकती। कलाकारों के साथ बेहतर समन्वय, समयबद्ध कार्यक्रम, दर्शकों के लिए स्पष्ट जानकारी और व्यवस्थित प्रबंधन भी इसकी अहम कसौटियां हैं।

यदि किसी अपरिहार्य कारण से कार्यक्रम तय समय तक नहीं चल पाता, तो आयोजकों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। दर्शकों की शिकायतों को गंभीरता से सुनना और उनके सवालों का जवाब देना भी आयोजन की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

डभरा के डांडिया आयोजनों को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दर्शकों को प्रचार में दिखाई गई उम्मीदों के अनुरूप मनोरंजन मिला?

Rajendra Rathore

राजेंद्र राठौर विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उनके परिवार में पत्रकारिता का कोई पारंपरिक इतिहास नहीं रहा, फिर भी उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की। उन्होंने वर्ष 2001 में दैनिक नवभारत में सर्वेयर के रूप में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। वर्ष 2017 में उन्होंने दैनिक नवीन कदम समाचार पत्र समूह में कार्यभार संभाला और तब से वे आज पर्यंत “स्थानीय संपादक” के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!