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तालाब में डूबने से मौत पर बीमा दावा खारिज करना पड़ा महंगा, उपभोक्ता आयोग ने 10.35 लाख रुपए देने का दिया आदेश

बीमा अवधि के दौरान 28 जनवरी 2024 को भिखारी लाल की तालाब में डूबने से मृत्यु हो गई। नामिनी ने बीमा दावा प्रस्तुत किया, लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा अस्वीकार कर दिया कि मृतक मिर्गी का मरीज था और उसी बीमारी की जटिलताओं के कारण उसकी पानी में डूबकर मृत्यु हुई।

जांजगीर-चांपा। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जांजगीर-चांपा ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बीमा कंपनी द्वारा दुर्घटना बीमा की राशि देने से इंकार को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना है। आयोग ने बीमा कंपनी को शिकायतकर्ता को 10 लाख रुपए की बीमा राशि, 30 हजार रुपए मानसिक क्षतिपूर्ति तथा 5 हजार रुपए वाद व्यय सहित कुल 10.35 लाख रुपए 45 दिनों के भीतर अदा करने का आदेश दिया है।

मामले के अनुसार, बलौदा तहसील निवासी सुशीला बाई बिन्झवार के पति स्व. भिखारी लाल का छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक में जनधन बचत खाता था। उन्होंने 30 अक्टूबर 2023 को 500 रुपए प्रीमियम जमा कर एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ग्रुप पर्सनल दुर्घटना बीमा योजना ली थी। यह बीमा 29 अक्टूबर 2024 तक प्रभावी था और सुशीला बाई नामिनी थीं।

बीमा अवधि के दौरान 28 जनवरी 2024 को भिखारी लाल की तालाब में डूबने से मृत्यु हो गई। नामिनी ने बीमा दावा प्रस्तुत किया, लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा अस्वीकार कर दिया कि मृतक मिर्गी का मरीज था और उसी बीमारी की जटिलताओं के कारण उसकी पानी में डूबकर मृत्यु हुई।

शिकायतकर्ता ने इसके बाद जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया। आयोग के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू, सदस्य विशाल तिवारी एवं सदस्य महिमा सिंह ने दोनों पक्षों के शपथपत्र, दस्तावेज और तर्कों का परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट बताया गया है तथा कहीं भी मिर्गी से मृत्यु होने का उल्लेख नहीं है। बीमा कंपनी भी मृतक के मिर्गी रोगी होने अथवा उसी कारण मृत्यु होने का कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।

आयोग ने उच्चतम न्यायालय के न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए माना कि बिना पर्याप्त आधार के बीमा दावा अस्वीकार करना सेवा में कमी एवं अनुचित व्यापारिक व्यवहार है। इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत शिकायत स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को 10 लाख रुपए की बीमा राशि, 30 हजार रुपए मानसिक क्षतिपूर्ति और 5 हजार रुपए वाद व्यय 45 दिनों के भीतर अदा करने का निर्देश दिया गया। आदेश का पालन नहीं करने की स्थिति में आदेश की तिथि से भुगतान तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

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