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वैनगंगा किनारे खुदाई में मिला रहस्यमयी पाषाण सिंहासन, क्या सिंधु घाटी जैसी किसी प्राचीन सभ्यता के हैं संकेत!

श्री दूधाधारी मठ रायपुर के महामंडलेश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास महाराज ने इस खोज पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पत्थर पूरी तरह पाषाण से निर्मित है और पहली नजर में अत्यंत प्राचीन प्रतीत होता है। उनके अनुसार यह किसी देव प्रतिमा का सिंहासन, महात्माओं के उपयोग की वस्तु या किसी प्राचीन धार्मिक परंपरा से जुड़ा अवशेष हो सकता है। हालांकि इसकी वास्तविक पहचान इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।

राजेंद्र राठौर@भंडारा (महाराष्ट्र)। महाराष्ट्र के भंडारा जिले के पवनी स्थित वैनगंगा नदी के तट पर श्री राम मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान हुई नींव की खुदाई में एक ऐसा पाषाण निर्मित अवशेष मिला है, जिसने इतिहास और पुरातत्व को लेकर नई जिज्ञासा पैदा कर दी है। पत्थर से बना यह रहस्यमयी स्वरूप देखने वालों को हैरान कर रहा है। प्रारंभिक तौर पर इसे देवी-देवताओं का सिंहासन, किसी तपस्वी के उपयोग का आसन अथवा चंदन घिसने में प्रयुक्त प्राचीन शिल्प माना जा रहा है।

सबसे रोचक बात यह है कि इस पाषाण पर स्वास्तिक चिन्ह भी अंकित दिखाई देता है, जिससे इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह खोज ऐसे स्थान पर हुई है, जहां सदियों पुराना धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास मौजूद है।

श्री दूधाधारी मठ रायपुर के महामंडलेश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास महाराज ने इस खोज पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पत्थर पूरी तरह पाषाण से निर्मित है और पहली नजर में अत्यंत प्राचीन प्रतीत होता है। उनके अनुसार यह किसी देव प्रतिमा का सिंहासन, महात्माओं के उपयोग की वस्तु या किसी प्राचीन धार्मिक परंपरा से जुड़ा अवशेष हो सकता है। हालांकि इसकी वास्तविक पहचान इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।

मीडिया प्रभारी निर्मल दास वैष्णव ने बताया कि यह अवशेष कायांतरित (रूपांतरित) चट्टान से निर्मित प्रतीत होता है, जिसका निर्माण भूगर्भीय प्रक्रियाओं के दौरान अत्यधिक ताप और दाब से होता है। उनका मानना है कि जिस प्रकार विश्व की प्राचीन सभ्यताएं—जैसे सिंधु घाटी सभ्यता और नील नदी की सभ्यता—नदियों के किनारे विकसित हुई थीं, उसी प्रकार वैनगंगा घाटी में भी किसी अज्ञात प्राचीन सभ्यता के अवशेष छिपे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, अब तक इस दावे की कोई आधिकारिक पुरातात्विक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन खुदाई में मिले इस रहस्यमयी पाषाण ने स्थानीय लोगों, इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के बीच उत्सुकता बढ़ा दी है। यदि विशेषज्ञों की जांच में यह अवशेष प्राचीन सभ्यता से जुड़ा पाया जाता है, तो यह खोज क्षेत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ सकती है।

उल्लेखनीय है कि पवनी स्थित वैनगंगा तट पर श्री स्वामी गरीबदास जी महाराज की तपोभूमि माने जाने वाले श्री राम मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ हो चुका है। इसी कार्य का निरीक्षण करने 30 जून 2026 को राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास महाराज अपने सहयोगियों के साथ यहां पहुंचे थे। इस दौरान निर्मल दास वैष्णव, हर्ष दुबे, राजीव लोचन त्रिपाठी, जनक राम साहू एवं सुरक्षा अधिकारी अनिल पांडे सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वैनगंगा की धरती के नीचे कोई भूली-बिसरी सभ्यता दफन है, या यह केवल एक प्राचीन धार्मिक अवशेष? इसका जवाब आने वाले समय में विशेषज्ञों की जांच ही दे सकेगी।

Rajendra Rathore

राजेंद्र राठौर विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उनके परिवार में पत्रकारिता का कोई पारंपरिक इतिहास नहीं रहा, फिर भी उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की। उन्होंने वर्ष 2001 में दैनिक नवभारत में सर्वेयर के रूप में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। वर्ष 2017 में उन्होंने दैनिक नवीन कदम समाचार पत्र समूह में कार्यभार संभाला और तब से वे आज पर्यंत “स्थानीय संपादक” के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

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