BDM Hospital Champa में नियम विरुद्ध डेंटल असिस्टेंट की भर्ती, जीवनदीप समिति के खजाने में बढ़ा बेवजह का बोझ
आय से अधिक खर्च के बीच नियुक्ति पर उठे सवाल, मरीजों की सुविधाओं के लिए बनी समिति की राशि वेतन भुगतान में हो रही खर्च

एनकेडी@चांपा। स्वर्गीय बिसाहूदास महंत स्मृति शासकीय चिकित्सालय चांपा में जीवनदीप समिति के संचालन और वित्तीय प्रबंधन को लेकर एक और गंभीर मामला सामने आया है। अस्पताल में कथित तौर पर नियमों के विपरीत डेंटल असिस्टेंट की भर्ती किए जाने का आरोप लग रहा है, जिससे पहले से आर्थिक दबाव झेल रही जीवनदीप समिति पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। मामले को लेकर अस्पताल प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, जीवनदीप समिति का गठन अस्पतालों में मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने, आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करने तथा स्थानीय स्तर पर त्वरित जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से किया जाता है। समिति के पास उपलब्ध राशि का उपयोग आमतौर पर मरीज हित से जुड़े कार्यों, छोटे-मोटे मरम्मत कार्यों, उपकरणों की व्यवस्था और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए किया जाना चाहिए। लेकिन, चांपा अस्पताल में समिति की राशि का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन भुगतान में खर्च होने की बात सामने आ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, अस्पताल में डेंटल असिस्टेंट के पद पर की गई नियुक्ति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि यह भर्ती न तो वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप की गई और न ही इसके लिए निर्धारित नियमों एवं प्रक्रिया का पालन किया गया। यही वजह है कि इस नियुक्ति को लेकर अस्पताल के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चाएं तेज हो गई हैं।
पहले से घाटे की स्थिति में समिति
जानकारी के अनुसार, चांपा अस्पताल की जीवनदीप समिति की सालाना आय लगभग साढ़े आठ लाख रुपये के आसपास है। इसमें सिविल सर्जन स्तर से प्राप्त होने वाली लगभग पांच लाख रुपये की राशि तथा विभिन्न शुल्कों से प्राप्त करीब साढ़े तीन लाख रुपये शामिल हैं।
वहीं दूसरी ओर समिति के माध्यम से रखे गए लगभग डेढ़ दर्जन कर्मचारियों के वेतन पर ही सालाना करीब नौ लाख रुपये खर्च होने की बात सामने आ रही है। यानी समिति की कुल आय से अधिक राशि केवल वेतन मद में खर्च हो रही है। ऐसे में डेंटल असिस्टेंट जैसी अतिरिक्त नियुक्तियों ने समिति की आर्थिक स्थिति को और कमजोर करने का काम किया है।
जरूरत या चहेतों को समायोजित करने की कोशिश?
अस्पताल से जुड़े सूत्रों का दावा है कि जीवनदीप समिति के माध्यम से कई नियुक्तियां वास्तविक आवश्यकता के बजाय प्रभावशाली लोगों की सिफारिश पर की गई हैं। डेंटल असिस्टेंट की नियुक्ति को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब समिति पहले से सीमित संसाधनों के सहारे संचालित हो रही है और आय से अधिक खर्च की स्थिति बनी हुई है, तब नई भर्ती की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अस्पताल में वास्तव में डेंटल सेवाओं के लिए अतिरिक्त मानव संसाधन की जरूरत थी तो इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति लेकर नियमानुसार प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। लेकिन यदि नियमों की अनदेखी कर भर्ती की गई है तो इसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
मरीज सुविधाओं पर पड़ सकता है असर
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि जीवनदीप समिति की राशि सीमित होती है और इसका उद्देश्य मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। यदि समिति का अधिकांश बजट वेतन भुगतान में ही खर्च होने लगेगा तो अस्पताल में आवश्यक उपकरणों की खरीदी, बुनियादी सुविधाओं के सुधार और मरीज हित से जुड़े अन्य कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
अस्पताल में आने वाले कई लोगों का कहना है कि मरीजों की सुविधा बढ़ाने के बजाय यदि समिति को रोजगार वितरण का माध्यम बना दिया जाएगा तो इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जीवनदीप समिति की आय-व्यय और नियुक्तियों की जानकारी जिला स्तर के स्वास्थ्य अधिकारियों को होने के बावजूद अब तक किसी प्रकार की जांच या समीक्षा की कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे यह सवाल उठ रहे हैं कि आखिर नियम विरुद्ध नियुक्तियों और बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर जिम्मेदार अधिकारी मौन क्यों हैं।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए जाने, जीवनदीप समिति में की गई नियुक्तियों की समीक्षा करने तथा समिति की आय-व्यय का विशेष ऑडिट कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मरीजों की सुविधाओं के लिए बनाई गई यह व्यवस्था वित्तीय अव्यवस्था का शिकार हो सकती है।
बड़ा सवाल
जब जीवनदीप समिति की आय ही कर्मचारियों के वेतन खर्च को पूरा नहीं कर पा रही है, तब नियम विरुद्ध बताई जा रही नई नियुक्तियों को स्वीकृति किस आधार पर दी गई और इससे किसका हित साधा जा रहा है? यही सवाल अब चांपा अस्पताल की व्यवस्था पर गंभीर चर्चा का विषय बनता जा रहा है।



