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गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. आलोक बंसल की सूझबूझ से युवक को बिना सर्जरी मिली नई जिंदगी, दुर्लभ पैंक्रियाटिक बीमारी का हुआ सफल एंडोस्कोपिक उपचार

डॉ. बंसल ने बताया कि यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से काफी जटिल होती है। कई प्रयासों के बाद चिकित्सकों ने डक्ट के दोनों हिस्सों को सफलतापूर्वक जोड़ते हुए स्टेंट स्थापित किया। इसके बाद पैंक्रियाटिक जूस का प्रवाह दोबारा सामान्य रूप से छोटी आंत में शुरू हो गया। परिणामस्वरूप पेट और फेफड़ों में द्रव भरना बंद हो गया, संक्रमण नियंत्रित हुआ और मरीज की पाचन क्रिया भी सामान्य होने लगी।

जबलपुर। आधुनिक एंडोस्कोपिक तकनीक और चिकित्सकों की सूझबूझ ने एक 30 वर्षीय युवक को बड़ी सर्जरी और संभावित गंभीर जटिलताओं से बचा लिया। जबलपुर के गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक में रोशन जॉर्ज नामक युवक का दुर्लभ बीमारी डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम (DPDS) का सफल इलाज किया गया। यह बीमारी एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस के बाद विकसित हुई थी, जिसके कारण मरीज की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

जानकारी के अनुसार, पैंक्रियास में तीव्र सूजन के दौरान पैंक्रियाटिक डक्ट क्षतिग्रस्त होकर बीच से अलग हो गई थी। इसके कारण पैंक्रियास से निकलने वाला जूस छोटी आंत तक पहुंचने के बजाय शरीर के अन्य हिस्सों में रिसने लगा। मरीज को लगातार बुखार, दस्त, कमजोरी, भूख न लगना और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब उसके दाएं फेफड़े में बड़ी मात्रा में द्रव भर गया और ऑक्सीजन स्तर कम होने लगा।

गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. आलोक बंसल और उनकी टीम ने जांच के दौरान बीमारी के असामान्य संकेतों को पहचानते हुए डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम की आशंका जताई। आगे की जांच में इसकी पुष्टि होने के बाद मरीज का तत्काल उपचार शुरू किया गया। पहले फेफड़े में भरे द्रव को निकाला गया, फिर ईआरसीपी (ERCP) तकनीक के माध्यम से पैंक्रियाटिक डक्ट के टूटे हुए दोनों सिरों को जोड़ने की चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया की गई।

डॉ. बंसल ने बताया कि यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से काफी जटिल होती है। कई प्रयासों के बाद चिकित्सकों ने डक्ट के दोनों हिस्सों को सफलतापूर्वक जोड़ते हुए स्टेंट स्थापित किया। इसके बाद पैंक्रियाटिक जूस का प्रवाह दोबारा सामान्य रूप से छोटी आंत में शुरू हो गया। परिणामस्वरूप पेट और फेफड़ों में द्रव भरना बंद हो गया, संक्रमण नियंत्रित हुआ और मरीज की पाचन क्रिया भी सामान्य होने लगी।

उपचार के बाद मरीज को नियमित फॉलोअप, एंटीबायोटिक थेरेपी और विशेष आहार संबंधी सलाह दी गई। करीब डेढ़ महीने की निगरानी और इलाज के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो गया। चिकित्सकों का कहना है कि यदि समय पर सही निदान नहीं होता तो मरीज को बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ सकता था, जिससे पैंक्रियास के एक हिस्से को निकालने की नौबत आ सकती थी। सफल एंडोस्कोपिक उपचार के कारण न केवल मरीज की जान बची, बल्कि भविष्य में इंसुलिन पर निर्भरता और अन्य गंभीर जटिलताओं की आशंका भी टल गई।

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