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जनपद पंचायत अकलतरा: 53 लाख के एरियर्स घोटाले में घिरे तत्कालीन सीईओ हिमांशु गुप्ता और क्लर्क हजारी प्रसाद राठौर, पंचायत व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

मामले में तत्कालीन सीईओ हिमांशु गुप्ता और क्लर्क हजारी प्रसाद राठौर की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि दोनों की मिलीभगत से नियमों को ताक पर रखकर सरकारी राशि का बंदरबांट किया गया।

एनकेडी@जांजगीर-चांपा। जनपद पंचायत अकलतरा में पंचायत सचिवों के एरियर्स भुगतान के नाम पर हुए 53 लाख रुपए के कथित महाघोटाले ने पूरे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामले में तत्कालीन सीईओ हिमांशु गुप्ता और क्लर्क हजारी प्रसाद राठौर की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि दोनों की मिलीभगत से नियमों को ताक पर रखकर सरकारी राशि का बंदरबांट किया गया।

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सूत्रों के मुताबिक, पंचायत सचिवों के एरियर्स भुगतान के लिए तैयार की गई सूची में भारी गड़बड़ी सामने आई है। कई कर्मचारियों के नाम पर वास्तविक पात्रता से कहीं अधिक राशि दर्ज की गई, जबकि कुछ सचिवों को भुगतान ही नहीं मिला। पूरे मामले में दस्तावेजों से छेड़छाड़, फर्जी गणना और मनमाने भुगतान के आरोप लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिन सचिवों के नाम पर लाखों रुपए स्वीकृत किए गए, उनमें कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने खुद इस राशि की जानकारी होने से इनकार किया। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि भुगतान प्रक्रिया में गंभीर वित्तीय अनियमितता हुई है।

तत्कालीन सीईओ गुप्ता के कार्यकाल पर सवाल

तत्कालीन सीईओ हिमांशु गुप्ता के कार्यकाल में हुए इस कथित घोटाले को लेकर प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना उच्च स्तरीय अनुमति और परीक्षण के इतनी बड़ी राशि कैसे जारी कर दी गई? क्या भुगतान से पहले दस्तावेजों का सत्यापन हुआ था या फिर पूरा खेल अंदरखाने तय स्क्रिप्ट के तहत संचालित किया गया? आरोप यह भी हैं कि शिकायतें मिलने के बावजूद लंबे समय तक मामले को दबाने का प्रयास किया गया। यदि समय रहते जांच नहीं होती तो यह पूरा मामला सरकारी फाइलों में ही दबकर रह जाता।

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क्लर्क हजारी प्रसाद पर दस्तावेजी हेरफेर के आरोप

इस मामले में क्लर्क हजारी प्रसाद राठौर की भूमिका भी संदेहों के घेरे में है। आरोप है कि एरियर्स सूची तैयार करने, राशि निर्धारण और भुगतान प्रक्रिया में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारियों का कहना है कि भुगतान संबंधी रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां हैं, जिनकी जवाबदेही संबंधित लिपिकीय शाखा पर भी बनती है। सूत्रों का दावा है कि फाइलों में दर्ज राशि और वास्तविक भुगतान में अंतर की शिकायतें सामने आने लगी हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित आर्थिक अनियमितता मानी जाएगी।

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कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश, एफआईआर की मांग

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर ने एसडीएम अकलतरा को जांच के आदेश दे दिए हैं। अब पूरे जिले की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच निष्पक्ष होगी या फिर मामला रसूख और प्रभाव के दबाव में ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। इधर, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि मामले में केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं है, बल्कि आर्थिक अपराध शाखा से जांच कराकर दोषियों पर एफआईआर दर्ज की जाए। लोगों का कहना है कि यदि करोड़ों के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हो सकती है तो पंचायत स्तर पर हुए इस बड़े खेल में भी जिम्मेदार अधिकारियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

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जनता पूछ रही-आखिर किसके भरोसे सुरक्षित है सरकारी धन?

ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और कर्मचारियों के अधिकारों के नाम पर आने वाली सरकारी राशि यदि इसी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही तो शासन की योजनाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होना तय है। पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करने वाले अधिकारी अब खुद सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या फिर 53 लाख के इस कथित घोटाले के असली जिम्मेदारों तक प्रशासन पहुंच पाता है।

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